कुलपति-कुलसचिव के आपसी खींचतान से विश्वविद्यालय की साख दांव पर

एक तरफ वाहवाही लूटने छात्रहित में निर्णय, अंदरखाने में चल रही कुर्सी की जंग

एक-दूसरे को अयोग्य बताने में पीछे नहीं, उठ रहा सवाल-छात्रों का भविष्य क्या होगा?

अंबिकापुर। सरगुजा का संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय इन दिनों बाहर से कहने के लिए छात्रहित में फैसले ले रहा है, अंदर से अफसरों की जंग का अखाड़ा बना हुआ है। कुलपति जहां एक ओर कुलसचिव की नियुक्ति को चैलेंज करते हुए उन्हें अयोग्य बताने में लगे हैं, और कहते हैं कि यहां पहले से भ्रष्टाचार चल रहा था, जिसे उन्होंने रोकने की कोशिश की। भ्रष्टाचार रोका तो ये कुछ ठेकेदारों के साथ मिलकर उनका विरोध करने लगे। वहीं कुलसचिव भी कुलपति की योग्यता को हासिए में लेकर भ्रष्टाचार करने की बातों पर जोर दे रहे हैं। इनका कहना है कि निजी स्वार्थों की पूर्ति नहीं होने के कारण उन्हें आरोपों के घेरे में लिया जा रहा है।बता दें कि, एक तरफ कुलपति प्रो. राजेंद्र लाकपाले ने छात्रों की असाइनमेंट फीस माफ कर 500 रुपये तक की राहत का ऐलान किया, दूसरी तरफ उन्हीं कुलपति और कुलसचिव डॉ. शारदा प्रसाद त्रिपाठी के बीच ऐसा घमासान छिड़ा है कि मामला सीधे शासन तक पहुंच गया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक बड़ा खुलासा ये भी है कि इस विश्वविद्यालय को सरकार से सिर्फ 2 करोड़ रुपये मिलते हैं, जबकि इसका सालाना खर्च 6 करोड़ 80 लाख रुपये है। यानी 4 करोड़ 80 लाख रुपये का बोझ सीधे छात्रों की फीस से निकलता है। छात्रों के पैसे से चलने वाले विश्वविद्यालय में बेहतर शिक्षा के बजाय अगर आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा हो, तो सवाल उठना लाजमी है।बहरहाल अब गेंद शासन के पाले में है। दोनों तरफ से लगाए गए भ्रष्टाचार, अयोग्यता और नियम विरुद्ध काम के आरोपों की निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने ला सकती है। 2 करोड़ सरकारी अनुदान और 4.80 करोड़ छात्रों की फीस से चलने वाले इस विश्वविद्यालय में अगर अफसरशाही की लड़ाई जारी रही, तो सबसे बड़ा नुकसान उसी छात्र का होगा, जिसे 500 रुपये की राहत देकर खुश करने की कोशिश की जा रही है।

कुलपति का मास्टर स्ट्रोक, छात्रों को राहत

विश्वविद्यालय ने 9 अक्टूबर को प्रेस विज्ञप्ति जारी करके बताया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 की दिसंबर सेमेस्टर परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन 1 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक पोर्टल पर भरे जा रहे हैं। पहले प्रति प्रश्नपत्र 100 रुपये असाइनमेंट शुल्क लिया जाता था। छात्र संगठनों की मांग पर कुलपति प्रो. राजेंद्र लाकपाले ने इसे माफ करने का निर्णय लिया। विश्वविद्यालय का दावा है कि इससे हर छात्र को 400 से 500 रुपये तक की सीधी बचत होगी। इस फैसले से कुलपति की छात्रहितैषी छवि बनी, लेकिन अंदर की कहानी बिल्कुल उलट है।

भ्रष्टाचार रोका तो ठेकेदारों से मिलकर करने लगे विरोध

इसी विश्वविद्यालय में कुलपति और कुलसचिव आमने-सामने हैं। कुलपति प्रो. राजेंद्र लाकपाले ने शासन को पत्र लिखकर कुलसचिव डॉ. शारदा प्रसाद त्रिपाठी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कुलपति का आरोप है कि कुलसचिव ठेकेदारों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं और इस पद के लिए योग्य ही नहीं हैं। उन्होंने कुलसचिव को पद से हटाने की मांग की है। एक बयान में कुलपति ने कहा-यहां के रजिस्ट्रार को अपने काम की जानकारी ही नहीं है। जांच में पता चला कि इस पद के लिए जो योग्यता चाहिए, वो इनमें है ही नहीं। शासन के राजपत्र अनुसार रजिस्ट्रार के लिए सहायक प्राध्यापक उच्च वेतनमान, सह प्राध्यापक उच्च वेतनमान या प्राध्यापक स्तर का अनुभव होना चाहिए। ये तो सहायक प्राध्यापक वेतनमान के हैं, इनका प्रोबेशन भी पूरा नहीं हुआ है।

कुलसचिव का पलटवार: निजी स्वार्थ पूरे नहीं कर रहा

कुलसचिव डॉ. शारदा प्रसाद त्रिपाठी ने पलटवार में कहा है कि ‘मेरी नियुक्ति शासन ने की है, मुख्यमंत्री के अनुमोदन से हुई है। मैं 35 वर्षों से उच्च शिक्षा विभाग में द्वितीय और प्रथम श्रेणी में पदस्थ हूं। रजिस्ट्रार का पद प्रतिनियुक्ति का पद है और मेरी नियुक्ति संवर्गीय प्रतिनियुक्ति पर हुई है। फिर भी योग्यता पर सवाल उठाना समझ से परे है।Ó कुलसचिव ने आरोप लगाया कि वे नियमों से काम कर रहे हैं। उन्हें शासन के नियमों को मानने और मनवाने के लिए नियुक्त किया गया है, किसी के व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं। कुछ लोगों के व्यक्तिगत स्वार्थ पूरे नहीं हो रहे, इसलिए अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं। मैं नियमों को ताक पर नहीं रख सकता। मेरे पास भी शासन को बताने के लिए पर्याप्त चीजें हैं।

ऐसे में कैसे दूर होंगी छात्रहित की समस्याएं

इस जंग के बीच विश्वविद्यालय का भकुरा स्थित नया परिसर भी सवालों के घेरे में है। वहां मिट्टी खनन, फर्नीचर, सफाई सामग्री की खरीदी और सुरक्षा व्यवस्था के टेंडरों में गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। विश्वविद्यालय का भवन आज भी अधूरा है। रिजल्ट में त्रुटियों, फीस बढ़ोतरी को लेकर छात्र पहले ही कई बार आंदोलन कर चुके हैं। इन सबके बीच कुलपति का दावा है कि छात्रों का कोई नुकसान नहीं होगा, सारे रिजल्ट निकाले जा चुके हैं, एडमिशन और कक्षाएं शुरू हो गई हैं। लेकिन हकीकत ये है कि जिस विश्वविद्यालय का 70 प्रतिशत खर्च छात्रों की फीस से चलता हो, वहां प्रबंधन का ध्यान बेहतर लैब, बेहतर क्लास और अधूरे भवन को पूरा करने पर होना चाहिए, न कि एक-दूसरे को अयोग्य साबित करने पर।

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