अंतिम विदाई के पहले उजाले का दान, स्व. ओमप्रकाश अग्रवाल की आंखें देखेंगी दुनिया

शोक की घड़ी में स्वजन ने लिया नेत्रदान का फैसला, सूचना मिलने पर देर रात डॉक्टरों टीम पहुंची घर

अंबिकापुर। कहते हैं कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसके कर्म और उसकी सोच समाज में जिंदा रहती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है अंबिकापुर के प्रतिष्ठित अग्रवाल परिवार ने। अपनों को खोने के गहरे दु:ख के बीच परिवार ने जो संवेदनशील फैसला लिया, उसने न सिर्फ एक परिवार की सोच को बदला है, बल्कि पूरे सरगुजा संभाग के लिए नेत्रदान को लेकर एक नई जागरूकता और प्रेरणा पैदा की है।

शहर के ओमप्रकाश अग्रवाल का निधन 25 अक्टूबर को रात्रि 9.45 बजे हो गया। घर में मातम पसरा था, परिजन शोक में डूबे थे। इसी बीच उनके पुत्र कृष्ण कुमार अग्रवाल ने एक ऐसा निर्णय लिया जो आम तौर पर दु:ख की घड़ी में लेना बहुत कठिन होता है। उन्होंने अपने पिता की आंखों का दान करने का निर्णय लिया। परिवार के सभी सदस्यों ने इस पुनीत निर्णय पर सहमति जताई। परिजनों की सूचना मिलते ही नेत्रदान दल सक्रिय हुआ। रात के समय भी टीम ने तत्परता दिखाते हुए महज लगभग दो घंटे के भीतर, रात्रि 11.38 बजे नेत्र ऊतक प्राप्त करने की पूरी प्रक्रिया को सम्मानपूर्वक संपन्न करा दिया। समय पर सूचना और परिजनों की जागरूकता से यह संभव हो पाया। स्व. ओमप्रकाश के परिवार ने यह साबित कर दिया कि किसी के जाने के बाद भी उसकी आंखें इस दुनिया को देख सकती हैं।

डॉ. अभिजीत जैन के नेतृत्व में टीम ने दिखाई तत्परता

इस पूरे मानवीय कार्य को सफल बनाने में नेत्रदान दल के टीम लीडर डॉ. अभिजीत जैन की भूमिका सबसे अहम रही। उनके नेतृत्व में डॉ. अभिषेक, डॉ. कंचन, नेत्र सहायक अधिकारी एवं सहायक नेत्रदान अधिकारी रमेश घृतकर की टीम ने पूरी प्रक्रिया को सम्मानजनक तरीके से पूरा किया। प्राप्त नेत्र ऊतकों को सुरक्षित रूप से सिम्स, बिलासपुर भेजने के लिए जयप्रकाश विश्वकर्मा ने विशेष सहयोग प्रदान किया, ताकि समय रहते किसी जरूरतमंद को कॉर्निया प्रत्यारोपित किया जा सके। इस कार्य में राजमाता श्रीमती देवेंद्रकुमारी सिंहदेव शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, अंबिकापुर के अधिष्ठाता डॉ. अविनाश मेश्राम, सिविल सर्जन डॉ. जे.के. रेलवानी और नोडल अधिकारी डॉ. रजत टोप्पो का भी निरंतर मार्गदर्शन और सहयोग रहा। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने इसे एक प्रेरणादायक पहल बताते हुए परिवार के निर्णय की सराहना की है।

बता दें कि, भारत में लाखों लोग कॉर्निया संबंधी दृष्टिहीनता के कारण अंधेरे में जीवन जीने मजबूर हैं, जबकि नेत्रदान से उन्हें नई रोशनी मिल सकती है। एक व्यक्ति के नेत्रदान से दो कॉर्निया ब्लाइंड व्यक्तियों को दृष्टि मिल सकती है। नेत्रदान को लेकर कई भ्रांतियां हैं। लोग सोचते हैं कि अधिक उम्र, चश्मा लगना या मोतियाबिंद होने पर नेत्रदान नहीं हो सकता, जबकि चिकित्सकीय सच्चाई यह है कि ये सभी लोग भी संभावित नेत्रदाता हो सकते हैं। दान के बाद ऊतकों की गुणवत्ता की जांच विशेषज्ञ करते हैं और तय करते हैं कि वह प्रत्यारोपण योग्य है या नहीं।

नेत्रदान की प्रक्रिया और सावधानियां

नेत्रदान मृत्यु के बाद ही होता है, इसके लिए मृत्यु के 6 घंटे के भीतर नजदीकी आई बैंक या नेत्र विभाग को सूचना देना जरूरी है। यदि व्यक्ति ने जीवनकाल में संकल्प नहीं लिया है, तब भी निकट परिजन लिखित सहमति देकर दान करा सकते हैं। प्रशिक्षित दल द्वारा ऊतक लेने की प्रक्रिया सम्मानपूर्वक की जाती है, इससे चेहरे की बनावट विकृत नहीं होती और अंतिम संस्कार की परंपराओं में कोई बाधा नहीं आती। दल के आने तक मृतक की पलकों को धीरे से बंद रखें, बंद पलकों पर साफ नम रुई या गॉज रखें, सिर को थोड़ा ऊंचा रखें और पंखा बंद कर दें। नेत्रदान पूरी तरह स्वैच्छिक है। मानव नेत्रों की खरीद-बिक्री कानूनन प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध है।

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