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आदिवासी की जमीन पर फर्जी दस्तावेज से कब्जा, और कोर्ट से अभियोजन की बिना सुने जमानत देने का आरोप


जमीन घोटाले के मामले ने कलेक्टर ने अपील का दिया आदेश

अंबिकापुर। सरगुजा जिले में आदिवासियों की जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे हड़पने के सनसनीखेज मामले में आरोपित आजाद इराकी को जमानत देने के मामले ने अभियोजन विभाग को सकते में डाल दिया है। आरोप है कि अदालत ने अभियोजन पक्ष को सुने बिना, उसकी अनुपस्थिति में ही जमानत का आदेश पारित कर दिया, और आदेश में यह भी लिख दिया कि शासन की ओर से एडीपीओ उपस्थित है। इस गंभीर लापरवाही और तथ्यों को छिपाए जाने को लेकर जिला अभियोजन निदेशालय, अंबिकापुर के उप निदेशक ने कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी सरगुजा को विस्तृत प्रतिवेदन सौंपा है। प्रतिवेदन को तत्काल संज्ञान लेते हुए कलेक्टर ने 30 सितंबर को दो अलग-अलग आदेश जारी कर जमानत आदेश के खिलाफ जिला एवं सत्र न्यायालय में अपील/पुनरीक्षण दायर करने की अनुमति दे दी है। जिला अभियोजन निदेशालय द्वारा कलेक्टर को प्रेषित पत्र दिनांक 26/09/2026 में पूरे षड्यंत्र का खुलासा किया गया है। बताया गया है कि आजाद इराकी पिता रियाजुद्दीन निवासी जयनगर, जिला सूरजपुर पर आरोप है कि उसने अपने साथियों के साथ मिलकर एक आपराधिक षड्यंत्र रचा। ग्राम की खसरा नंबर 3714, रकबा 0.231 हेक्टेयर भूमि जो गोंड जाति के व्यक्ति की है और अनुसूचित जनजाति वर्ग के तहत आती है, उसे हड़पने के लिए कूटरचित यानी फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, फर्जी दस्तावेजों को असली के रूप में तहसीलदार न्यायालय अंबिकापुर में प्रस्तुत किया गया। दस्तावेजों में हेरफेर कर जाति का विलोपन कर दिया गया और सामान्य वर्ग के आरोपित के नाम पर नामांतरण करा लिया गया। यानी तहसीलदार न्यायालय को धोखे में रखकर, छल करते हुए आदिवासी की जमीन को गैर आदिवासी के नाम कर दिया गया। इसी कृत्य पर थाना मणीपुर में भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं 318(4), 338, 336(3), 340(2), और 61(2) के तहत एफ़आईआर दर्ज की है। मामला दर्ज होते ही विवेचना शुरू हुई, जो अभी प्रारंभिक स्तर पर है।
अभियोजन पक्ष का यह है आरोप
25 सितम्बर को आरोपी आजाद इराकी की ओर से न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अंबिकापुर की अदालत में धारा 480 बीएनएसएस के तहत जमानत आवेदन प्रस्तुत किया गया। जिला अभियोजन का आरोप है कि न्यायालय द्वारा अभियोजन को बिना सुने ही शासन की ओर से एडीपीओ उपस्थित अंकित करते हुए मात्र आरोपी के अधिवक्ता को सुनकर और उनके द्वारा पेश किए गए तथ्यों एवं दस्तावेजों को ही आधार मानते हुए जमानत आवेदन स्वीकार कर आरोपी को जमानत दे दी गई।
प्रतिवेदन के बिंदु क्रमांक 2 में स्पष्ट लिखा है कि न्यायालय द्वारा अपने आदेश दिनांक 25/09/2026 में राज्य द्वारा ए.डी.पी.ओ. उपस्थित एवं आवेदन की प्रति अभियोजन को दी गई लेख किया गया है, किंतु उक्त तिथि को इस कार्यालय में पदस्थ किसी भी अभियोजन अधिकारी द्वारा उक्त न्यायालय में जमानत आवेदन के निराकरण हेतु अभियोजन की ओर से उपस्थिति नहीं दी गई है और न ही आरोपी की ओर से प्रस्तुत जमानत आवेदन की प्रति ही प्राप्त की गई है। इस संबंध में जिला अभियोजन निदेशालय द्वारा 25/09/2026 को उपस्थित सभी अभियोजन अधिकारियों से लिखित में जानकारी प्राप्त की गई, जिसमें सभी ने अपनी अनुपस्थिति की पुष्टि की है। यानी आदेश में जो लिखा गया, वह मौके पर था ही नहीं।
एससी/एसटी एक्ट के मामले में निचली अदालत से जमानत
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह जमीन गोंड आदिवासी की है। अभियोजन का कहना है कि उक्त स्थिति में प्रकरण में प्रथम दृष्टया अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा 3(एफ) भी आकर्षित होती है। कानून के अनुसार, एससी/एसटी एक्ट के मामलों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार अनन्य रूप से विशेष न्यायालय (एक्ट्रोसिटी) को है। निचली अदालत को इस मामले में जमानत देने का अधिकार ही नहीं था। किंतु अभियोजन को अपना पक्ष रखने हेतु न्यायालय में अवसर नहीं मिल पाने के कारण उक्त महत्वपूर्ण तथ्य न्यायालय के समक्ष रखा ही नहीं जा सका, जिससे अभियोजन को अपूरणीय क्षति हुई है। यदि अभियोजन पक्ष उपस्थित होता तो वह अदालत को बताता कि यह मामला विशेष न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का है। अभियोजन ने अपने प्रतिवेदन में स्पष्ट किया है कि प्रकरण गंभीर प्रकृति का है और न्यायालय द्वारा प्रकरण की गंभीरता एवं प्रथम सूचना रिपोर्ट में उल्लेखित तथ्यों का परिशीलन किए बिना ही अभियोजन को बिना सुने मात्र आरोपी के अधिवक्ता के तथ्यों के आधार पर जमानत का लाभ दिया गया है, जिसका न्यायहित में अपील/पुनरीक्षण किया जाना अति आवश्यक हो गया है।
कलेक्टर का एक्शन, दो आदेश जारी
जिला अभियोजन निदेशालय के प्रतिवेदन को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी सरगुजा ने 30 सितंबर 2026 को दो तत्काल आदेश जारी किए।
पहला आदेश उप निदेशक, जिला अभियोजन निदेशालय के नाम जारी किया गया, जिसमें कहा गया है कि थाना मणीपुर के अपराध क्र. 168/2026 में न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा पारित आदेश दिनांक 25.09.2026 के विरुद्ध जिला एवं सत्र न्यायाधीश अंबिकापुर के समक्ष अपील/पुनरीक्षण प्रस्तुत किए जाने की अनुमति प्रदान की जाती है। उक्त आदेश के विरुद्ध तत्काल नियमानुसार अपील प्रस्तुत करने की कार्रवाई सुनिश्चित करें। दूसरा आदेश लोक अभियोजक, जिला एवं सत्र न्यायालय अंबिकापुर को प्रतिलिपि के रूप में भेजा गया है, ताकि वे न्यायालय में शासन का पक्ष मजबूती से रख सकें। एक अन्य ज्ञापन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भी प्रेषित किया गया है। अब देखना यह होगा कि जिला एवं सत्र न्यायालय में इस जमानत आदेश के खिलाफ दायर होने वाली अपील पर क्या सुनवाई होती है। घटना ने एक बार फिर आदिवासी जमीनों की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में अभियोजन की भूमिका की अनिवार्यता पर बड़ी बहस छेड़ दी है।

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