असम की धरती पर बिखरा छत्तीसगढ़िया संस्कृति का रंग, सुआ-करमा की थाप पर झूमे लोग

केदारपुर प्रायोगिक स्कूल की शिक्षिका भावना सिंह ने किया सरगुजा का प्रतिनिधित्व

अंबिकापुर। पूर्वोत्तर भारत में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की गूंज सुनाई दी। असम के गुवाहाटी में आयोजित राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रशिक्षण शिविर में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकनृत्य, वेशभूषा और खानपान ने सभी का मन मोह लिया।

केंद्र सरकार के सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र (सीसीआरटी), नई दिल्ली द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यशाला में देशभर से शिक्षक जुटे। इसका मकसद एक-दूसरे के प्रदेश की कला और संस्कृति से रूबरू कराना है। इस राष्ट्रीय मंच पर सरगुजा जिले को गौरवान्वित किया है अंबिकापुर के केदारपुर स्थित प्रायोगिक स्कूल की शिक्षिका भावना सिंह ने। वे छत्तीसगढ़ से गए 15 प्रतिभागियों के दल में शामिल रहीं। भावना सिंह पहले से ही बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ सांस्कृतिक और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़कर शिक्षा देती हैं।

छत्तीसगढ़ी परंपरा से कराया रूबरू

प्रशिक्षण के दौरान छत्तीसगढ़ की टीम ने प्रदेश के राजकीय प्रतीकों, पारंपरिक व्यंजनों, रहन-सहन और प्राकृतिक सौंदर्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी। साथ ही सुआ, करमा और ददरिया जैसे प्रसिद्ध लोकनृत्यों की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान पेश की। इस दौरान छत्तीसगढ़ के प्रतिभागियों ने असमिया परिधान पहनकर फोटो भी खिंचवाई, जो आकर्षण का केंद्र रही।

हस्तशिल्प का भी ले रहे प्रशिक्षण

शिविर में सिर्फ सांस्कृतिक जानकारी ही नहीं, बल्कि पारंपरिक कला और हस्तशिल्प की व्यवहारिक क्लास भी चल रही है। प्रतिभागियों को जूट शिल्प, टेराकोटा कला, बेंत-बांस शिल्प, लोक चित्रकला, कठपुतली निर्माण और माइम एंड मूवमेंट जैसी विधाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शिक्षिका भावना सिंह ने बताया कि इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों की सांस्कृतिक समझ को व्यापक बनाना है, ताकि वे भारतीय कला और परंपराओं को स्कूली शिक्षा से जोड़ सकें और विद्यार्थियों को देश की विविध सांस्कृतिक विरासत से प्रभावी ढंग से परिचित करा सकें।

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